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Top 11 Beautiful Poem On Diwali in Hindi | दिवाली पर कविता 2022

Poem On Diwali: दोस्तों आप सभी लोगो को दिवाली की बहुत बहुत शुभकामनाएं. यहाँ हम आप सभी के लिए दिवाली 2022 कविता “Poem On Diwali” का एक लाजवाब संग्रह लेकर आएं है, जिसे आप अपने मित्रों और परिजनों के साथ सभी social media platforms पर share कर सकते हैं. आशा है आप सभी को ये संग्रह बहुत पसंद आएगा.

Poem On Diwali in Hindi

poem on diwali
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दीप जलाओ दीप जलाओ, आज दिवाली रे |
खुशी-खुशी सब हँसते आओ, आज दिवाली रे।

मैं तो लूँगा खील-खिलौने, तुम भी लेना भाई
नाचो गाओ खुशी मनाओ, आज दिवाली आई।

आज पटाखे खूब चलाओ, आज दिवाली रे
दीप जलाओ दीप जलाओ, आज दिवाली रे।

नए-नए मैं कपड़े पहनूँ, खाऊं खूब मिठाई
हाथ जोड़कर पूजा कर लूं, आज दिवाली आई।

poem on diwali
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आओ फिर से दिया जलाएं भरी दुपहरी में अंधियारा
सूरज परछाई से हारा अंतरतम का नेह निचोड़ें-
बुझी हुई बाती सुलगाएँ। आओ फिर से दिया जलाएँ
हम पड़ाव को समझे मंज़िल लक्ष्य हुआ आंखों से ओझल
वतर्मान के मोहजाल में- आने वाला कल न भुलाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ। आहुति बाकी यज्ञ अधूरा
अपनों के विघ्नों ने घेरा अंतिम जय का वज़्र बनाने-
नव दधीचि हड्डियां गलाएं। आओ फिर से दिया जलाएं

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दीपावली का त्योहार आया,
साथ में खुशियों की बहार लाया।
दीपको की सजी है कतार,
जगमगा रहा है पूरा संसार।
अंधकार पर प्रकाश की विजय लाया,
दीपावली का त्योहार आया।
सुख-समृद्धि की बहार लाया,
भाईचारे का संदेश लाया।
बाजारों में रौनक छाई,
दीपावली का त्योहार आया।
किसानों के मुंह पर खुशी की लाली आयी,
सबके घर फिर से लौट आई खुशियों की रौनक।
दीपावली का त्यौहार आया,
साथ में खुशियों की बहार लाया।

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आओ मिलकर दीप जलाएं
अँधेरा धरा से दूर भगाएं
रह न जाय अँधेरा कहीं घर का कोई सूना कोना
सदा ऐसा कोई दीप जलाते रहना
हर घर -आँगन में रंगोली सजाएं
आओ मिलकर दीप जलाएं.

हर दिन जीते अपनों के लिए
कभी दूसरों के लिए भी जी कर देखें
हर दिन अपने लिए रोशनी तलाशें
एक दिन दीप सा रोशन होकर देखें
दीप सा हरदम उजियारा फैलाएं
आओ मिलकर दीप जलाएं.

भेदभाव, ऊँच -नीच की दीवार ढहाकर
आपस में सब मिलजुल पग बढायें
पर सेवा का संकल्प लेकर मन में
जहाँ से नफरत की दीवार ढहायें
सर्वहित संकल्प का थाल सजाएँ
आओ मिलकर दीप जलाएं
अँधेरा धरा से दूर भगाएं…!

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दीपों का त्योहार दीवाली।
खुशियों का त्योहार दीवाली॥

वनवास पूरा कर आये श्रीराम।
अयोध्या के मन भाये श्रीराम।।

घर-घर सजे , सजे हैं आँगन।
जलते पटाखे, फ़ुलझड़ियाँ बम।।

लक्ष्मी गणेश का पूजन करें लोग।
लड्डुओं का लगता है भोग॥

पहनें नये कपड़े, खिलाते है मिठाई ।
देखो देखो दीपावली आई॥

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बरस रही है मां लक्ष्मी की कृपा,
हो रही है सुख और समृद्धि की वर्षा।
मिट जाएगा हर कोने का अंधियारा,
जब दीपो से जगमग होगा जग सारा।
भगवान श्री राम अयोध्या पधार रहे है,
फूलों की वर्षा हो रही है।
सब जन हर्षा रहे है,
हो गया है सब दुखों का नाश।
सब लोग मंगल गान गा रहे है,
फूल, पत्ती, पेड़-पौधे, फसलें लहरा रहे है।
सब लोगों के मुख पर मुस्कान है,
यही तो दीपावली त्योहार की पहचान है।

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साथी, घर-घर आज दिवाली !
फैल गयी दीपों की माला !!
मंदिर-मंदिर में उजियाला,
किंतु हमारे घर का, देखो, दर काला, दीवारें काली!
साथी, घर-घर आज दिवाली!
हास उमंग हृदय में भर-भर
घूम रहा गृह-गृह पथ-पथ पर,
किंतु हमारे घर के अंदर डरा हुआ सूनापन खाली!
साथी, घर-घर आज दिवाली!
आँख हमारी नभ-मंडल पर,
वही हमारा नीलम का घर,
दीप मालिका मना रही है रात हमारी तारोंवाली!
साथी, घर-घर आज दिवाली !
फैल गयी दीपों की माला !!

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जल, रे दीपक, जल तू, जिनके आगे अंधियारा है,
उनके लिए उजल तू, जोता, बोया, लुना जिन्होंने
श्रम कर ओटा, धुना जिन्होंने, बत्ती बंनकर तुझे संजोया,
उनके तप का फल तू जल, रे दीपक, जल तू
अपना तिल-तिल पिरवाया है, तुझे स्नेह देकर पाया है
उच्च स्थान दिया है घर में, रह अविचल झलमल तू
जल, रे दीपक, जल तू, चूल्हा छोड़ जलाया तुझको
क्या न दिया, जो पाया, तुझको भूल न जाना कभी ओट का
वह पुनीत अंचल तू, जल, रे दीपक, जल तू
कुछ न रहेगा, बात रहेगी, होगा प्रात, न रात रहेगी
सब जागें तब सोना सुख से तात, न हो चंचल तू
जल, रे दीपक, जल तू!

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ना फुलजड़ी फटाके बुलाते मुझे–
ना फुलजड़ी फटाके बुलाते मुझे
और ना गुलाब जामुन की खुशबू ललचाती मुझे
ना फुलजड़ी फटाके बुलाते मुझे
और ना गुलाब जामुन की खुशबू ललचाती मुझे
ना नए कपड़ों की चाहत खीचें मुझे
ना गहनों चमक लुभाए आये मुझे
मुझे तो चाहिए कुछ अनमोल घड़ी
जब फिर से जुड़ती अपनों से कड़ी
दिवाली की रंगत ना भाती मुझे
बस माँ की गोद ही याद आती मुझे
नहीं वो बचपन की दिवाली सजे
बस मुझे मेरे अपनों का साथ मिले
बस साथ मिले।

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किंतु हमारे घर का, देखो, दर काला, दीवारें काली!
साथी, घर-घर आज दिवाली! हास उमंग हृदय में भर-भर

घूम रहा गृह-गृह पथ-पथ पर,
किंतु हमारे घर के अंदर डरा हुआ सूनापन खाली!

साथी, घर-घर आज दिवाली! आँख हमारी नभ-मंडल पर,
वही हमारा नीलम का घर,

दीप मालिका मना रही है रात हमारी तारोंवाली!
साथी, घर-घर आज दिवाली!

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रात अमावस की तो क्या,
घर घर हुआ उजाला,
सजे कोना कोना दिपशिखा से!
मन मुटाव मत रखना भाई,
आयी दिवाली आयी !
झिलमिल झिलमिल
बिजली की, रंगबरंगी लड़ियां
दिल से हटा दो
फरेब की फुलझड़िया!
दिवाली पर्व हैं मिलन का,
नजर पड़े जिस और देखो
भरे हैं खुशियों से चेहरे !
चौदह बरस बाद लौटे हैं,
सिया लखन रघुराई
दिवाली का दिन हैं जैसे,
घर में हो कोई शादी!





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